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पहले खोया था जवान बेटा, अब सांड की टक्कर से पिता की भी गई जान; आवारा पशुओं और खस्ताहाल सड़कों ने फिर उजाड़ा एक परिवार

कन्नौज/सौरिख:
नियति का क्रूर मजाक और सिस्टम की अनदेखी जब एक साथ मिलते हैं, तो कैसे एक हंसता-खेलता परिवार तबाह हो जाता है, इसकी एक बेहद दर्दनाक और रुला देने वाली बानगी कन्नौज के छिबरामऊ तहसील क्षेत्र में देखने को मिली है। सौरिख के तिर्वा निवासी 58 वर्षीय राकेश गुप्ता (पुत्र रामेश्वर दयाल गुप्ता) की बुधवार, 26 अगस्त 2026 की रात एक सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई।

सूत्रों के मुताबिक, यह घटना रात लगभग 9:15 बजे की है। राकेश गुप्ता किसी निजी काम से अपनी बाइक से बिधूना रोड की तरफ गए हुए थे। काम निपटाने के बाद जब वे वापस अपने घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में मौत बनकर घूम रहे एक आवारा सांड ने उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। रात का अंधेरा और इलाके की जर्जर, गड्ढायुक्त सड़क के कारण राकेश बाइक पर नियंत्रण नहीं रख पाए। इस भयानक टक्कर में वे बुरी तरह घायल होकर सड़क पर गिर पड़े।
हादसे की सूचना मिलते ही बदहवास परिजन तुरंत मौके पर पहुंचे और उन्हें आनन-फानन में छिबरामऊ के सौ शैय्या अस्पताल ले गए। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी—डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। भारी मन और आंसुओं के बीच परिजनों ने किसी भी पुलिस या कानूनी कार्रवाई से इनकार कर दिया और शव को अपने घर ले आए।

इस परिवार की त्रासदी सिर्फ इस एक मौत तक सीमित नहीं है। इस घर पर पहले ही दुखों का एक बड़ा पहाड़ टूट चुका था। कुछ समय पहले इसी परिवार ने एक दर्दनाक हादसे में अपना एक बेटा खो दिया था। उस गहरे जख्म से परिवार अभी उबर भी नहीं पाया था कि अब घर के मुखिया राकेश गुप्ता का साया भी छिन गया। राकेश अपने पीछे पत्नी रेखा देवी, एक बेटे विनय और बेटी शिखा को बिलखता छोड़ गए हैं। घर में चीख-पुकार मची है और पूरा मोहल्ला इस दुखद घटना से स्तब्ध और नम आंखों में है।

यह सिर्फ एक हादसा नहीं है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का एक जीता-जागता सबूत है। आजकल सड़कें राहगीरों के लिए सुरक्षित नहीं रह गई हैं। खुलेआम और झुंड में घूम रहे आवारा जानवरों ने लोगों का घर से निकलना मुहाल कर दिया है। आए दिन लोग इन जानवरों की चपेट में आ रहे हैं—कोई असमय अकाल मौत के मुंह में समा रहा है, तो कोई हाथ-पैर तुड़वाकर जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो रहा है।
इस खतरे को और भी जानलेवा बना रही हैं इलाके की खस्ताहाल सड़कें। गड्ढों में तब्दील हो चुके रास्ते, धूल और अंधेरा इन आवारा जानवरों के साथ मिलकर हादसों का ऐसा चक्रव्यूह रचते हैं, जिसमें कोई भी आम इंसान आसानी से फंसकर अपनी जान गंवा बैठता है।

स्थानीय लोग लंबे समय से इन दोनों समस्याओं को लेकर अपनी आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन सिस्टम की कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। आज एक और सुहाग उजड़ गया, बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया, लेकिन बड़ा सवाल अब भी वहीं खड़ा है—आखिर और कितनी जानें जाने के बाद प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागेगा?

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