सौरिख कन्नौज मोहर्रम कमेटी अध्यक्ष अली अब्बास ने बताया कि मोहर्रम की सात तारीख को अलम का जुलूस निकलता था मगर कोरोना जैसी महामारी को देखते हुये इस साल इमामबाड़ों ब घरों पर ही अलम सजाये गये और फातेहा खानी कर परसाद(तबर्रुक) वितरण किया गया ,अली अब्बास ने कहा कि आप लोग जानते हैं मोहर्रम क्या है ,यूं तो मोहर्र्म इस्लामी साल का पहला महीना होता है जो चाँद के हिसाब से चलता है,जिसे हिजरी साल भी कहते हैं लेकिन आज मोहर्रम सिर्फ एक महीने का नाम नही रह गया है बल्कि आज मोहर्रम नाम है एक आंदोलन का भ्र्ष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन, अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदोलन, बुराइयों के ख़िलाफ़ आंदोलन दुनियाँ के सारे कलेंडर नये साल के साथ खुशियों का पैग़ाम लेकर आते हैं मगर सिर्फ एक स्लामी कलेंडर ऐसा होता है जो
नये साल के साथ ग़म का पैग़ाम लेकर आता है ,यह ग़म वह ग़म है जो सोते हुये इंसान को झिंझोड़ता है ,दिल के ज़ख्मो पर मरहम रखता है ,मज़लूमो के अंदर उम्मीद की किरन पैदा करता है और ज़ालिम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का हौसला देता है ।आज से तकरीबन चौदह सौ साल पहले सन इकसठ हिजरी में हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन अ०स०और उनके इकहत्तर साथियों के साथ इराक कर्बला के बियाबान में ज़ालिम आतंकवादी यज़ीद की फौज ने शहीद कर दिया था ,यज़ीद वह ज़ालिम बादशाह था जिसकी हुकूमत सिर्फ अरब देशों पर ही नही बल्कि ईरान,इराक,सीरिया,यमन यहां तक अमेरिका,रूस,योरोप आदि के कुछ हिस्सों पर भी थी उस ज़माने का सुपर पावर समझा जाता था ।यज़ीद मज़हब के नाम पर बुरीबातेँ फैलाना चाहता था अपनी अय्याशी ज़ुल्मो सितम को इस्लाम का नाम देना चाहता था ,उसको यह भी मालूम था कि वह अपने इस इरादे में कामयाब नही होगा जब तक इमाम हुसैन उसका समर्थन न करेंगे यही सोचकर उसने आदेश दिया कि इमाम हुसैन से समर्थन लिया जाये यदि वह समर्थन न दें तो उनका सर कलम कर लिया जाये इमाम हुसैन के मना करने पर यज़ीद ने इमाम हुसैन को तथा उनके घर बालों को शहीद कर दिया ,मगर आज यज़ीद का नाम लेने बाला इस दुनियां में कोई नही है और इमाम् हुसैन को मानने बाले सारी दुनिया के कोने कोने में मिलेंगे ।इमाम हुसैन ने अपना सर कटबाकर सत्य पर विजय हासिल की और यज़ीद असत्य पर था इस लिये वह हार गया ।गाइड लाइन को देखते हुये पुलिस प्रशासन की व्यवस्था चाक चौबंद रही ।
रिपोर्ट विलाल अली


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