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क्रेडिट कार्ड या अनसिक्योर्ड लोन धारक के निधन पर कौन चुकाएगा बकाया? जानिए क्या कहते हैं कानून और RBI के नियम

विशेष संवाददाता

देश में डिजिटल लेन-देन और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन किसी कार्डधारक या कर्जदार की अचानक मृत्यु हो जाने पर बकाये बिल को लेकर परिवारों में भारी असमंजस और डर देखा जाता है। अक्सर लोगों को यह बुनियादी जानकारी नहीं होती कि व्यक्ति के गुजर जाने के बाद कर्ज चुकाने की कानूनी देनदारी आखिर किसकी बनती है।

निजी बचत से पैसा नहीं मांग सकते बैंक होम लोन या ऑटो लोन जैसे सिक्योर्ड कर्जों में बैंक के पास घर या गाड़ी गिरवी होती है, जिसे न चुकाने पर बैंक सीधे जब्त कर सकता है। लेकिन, कानूनी और बैंकिंग नियमों के अनुसार क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन पूरी तरह से अनसिक्योर्ड (बिना गारंटी वाले) लोन की कैटेगरी में आते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि बैंक मृतक के पति, पत्नी, बच्चों या माता-पिता को अपनी निजी कमाई या निजी बचत से बकाया चुकाने के लिए कतई मजबूर नहीं कर सकते। दिल्ली डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के 2023 के एक ऐतिहासिक फैसले और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सख्त गाइडलाइंस ने कानूनी वारिसों के अधिकारों को पूरी तरह स्पष्ट और सुरक्षित कर दिया है।

विरासत में मिली संपत्ति तक ही है जिम्मेदारी कानूनन, बिना गारंटी वाले क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन के मामलों में मृतक के कानूनी वारिस व्यक्तिगत रूप से कर्ज चुकाने के लिए जिम्मेदार नहीं होते। हालांकि, अगर कानूनी वारिसों को मृतक की कोई प्रॉपर्टी विरासत में मिलती है, तो वे केवल उसी विरासत में मिली संपत्ति के मूल्य की सीमा तक ही देनदारी के लिए जिम्मेदार होंगे।

किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसके पीछे छोड़ी गई कुल जमा पूंजी, बैंक बैलेंस, फिक्स्ड डिपॉजिट, जमीन-जायदाद, शेयर और बाकी सामान को मिलाकर उससे बकाये का भुगतान करना होता है।

  • वसीयत होने पर: अगर मृतक ने वसीयत बनाई है, तो उसकी संपत्तियों में से सबसे पहले बैंकों और दूसरे लेनदारों का कर्ज चुकाया जाएगा, उसके बाद बची संपत्ति वारिसों में बंटेगी।
  • वसीयत न होने पर: अदालत द्वारा नियुक्त अधिकारी संपत्ति का मैनेजमेंट संभालता है और कानूनी नियमों के तहत कर्जों का निपटारा करता है।

संपत्ति कम होने पर 'राइट-ऑफ' का नियम मान लीजिए किसी व्यक्ति पर क्रेडिट कार्ड का बकाया 3 लाख रुपये है, लेकिन उसने अपने पीछे कुल 1.5 लाख रुपये की ही संपत्ति छोड़ी है। ऐसी स्थिति में बैंक को केवल वह 1.5 लाख रुपये ही मिलेंगे। बाकी बचे 1.5 लाख रुपये को बैंक बट्टे खाते में डालकर यानी 'राइट-ऑफ' करके नुकसान के तौर पर दर्ज करेगा। बैंक किसी भी परिजन से बाकी पैसे की मांग नहीं कर सकता।

जॉइंट अकाउंट और एड-ऑन कार्ड के नियम अलग इस पूरे मामले में यह समझना बहुत जरूरी है कि खाते का स्वरूप क्या था:

  • जॉइंट अकाउंट: अगर क्रेडिट कार्ड किसी दूसरे व्यक्ति के साथ मिलकर जॉइंट लिया गया था, तो मुख्य कार्डधारक की मौत के बाद भी दूसरे जीवित कार्डधारक पर पूरे बकाए को चुकाने की कानूनी जिम्मेदारी बनी रहती है।
  • एड-ऑन कार्ड: अधिकांश बैंक परिवार के सदस्यों को एड-ऑन कार्ड जारी करते हैं। एड-ऑन कार्डधारक केवल अधिकृत यूजर होता है, वह बैंक के साथ मूल कर्जदार के रूप में अनुबंध नहीं करता। इसलिए मुख्य कार्डधारक की मृत्यु होने पर एड-ऑन यूजर पर अपने निजी पैसे से बकाया भरने का कोई कानूनी दबाव नहीं बनाया जा सकता।

परिजनों को क्या करना चाहिए? अक्सर देखा जाता है कि कार्डधारक की मौत के तुरंत बाद रिकवरी एजेंट परिजनों पर फोन करके अनुचित दबाव बनाने लगते हैं। आरबीआई के स्पष्ट नियम रिकवरी एजेंसियों को परिजनों को परेशान करने से रोकते हैं। मानसिक तनाव से बचने के लिए परिवार को तुरंत ये कदम उठाने चाहिए:

  1. बैंक को लिखित सूचना: कार्ड को तुरंत ब्लॉक कराने के लिए बैंक को लिखित सूचना दें ताकि लेट फीस या ब्याज जुड़ना बंद हो।
  2. दस्तावेज जमा करें: बैंक में डेथ सर्टिफिकेट और लीगल हेयर सर्टिफिकेट (कानूनी वारिस प्रमाण पत्र) की कॉपी जमा कराएं।
  3. क्रेडिट शील्ड की जांच: कई बैंक क्रेडिट कार्ड पर 'क्रेडिट शील्ड' या लाइफ इंश्योरेंस कवर देते हैं। अगर यह एक्टिव है, तो इंश्योरेंस कंपनी सीधे बैंक का पूरा बकाया चुकता कर देती है।
  4. कार्ड का इस्तेमाल बंद करें: मृत्यु के बाद मृतक के क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग से कोई नया लेन-देन न करें, इसे कानूनी धोखाधड़ी माना जा सकता है।

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